तुम्हारी याद आयी

मक़बूल फ़िदा हुसैन

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आज यूँही बैठ कर कुछ पुरानी यादें खोली,
कहीं पर बात आ कर तुम पर रुकी!
तुम्हारी याद आयी ,
तुम्हारी तस्वीर, तुम , तुम्हारी दीवानगी ,
और शायद तुम !
कहीं पर बात आ कर तुम पर रुकी!
तुम्हारी याद आयी।
बस यूँही ,जाने कहाँ से ,
यूँही , एक बेबाक कमी शायद,
अभी तक ताज़ा और समय के पहरो को गिनती,
मेरे साथ , वो राह देखने लगी,
तुम गए, न फिर मुड़े।
तुम्हारी याद आयी ,
तुम्हारी तस्वीर, तुम , तुम्हारी दीवानगी ,
और शायद तुम !
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