World War One-Centenary Commemoration of Faith, Sacrifice, Bravery & Tradition of the Indian Soldier -क्या भारतीयों के पास युद्ध के मैदान पर उतरने के सिवा कोई अन्य विकल्प था ?

Loyal Indian Soldiers in World War One

भारतीय जवानों का यूरोप पहुंचने पर पुरज़ोर स्वागत किया गया 

Indians received a warm welcome in Europe on reaching to side with Britain & Allies

 In any civilized society, war might be the very last option to pursue, if any final decision to be reached. Violence could never be a befitting answer even to violation and an equivalent of violence. We, as an Indian, did not even have an option to justify the Great War; leave alone any solid answer to why we decided to help Britain during the World War One.

 On the theoretical grounds; India, back in 1914 might have had no option or in that case, any other choice. That was British Raj and the marching orders were coming from them. Indians were not even supposed or expected to be consulted. Indian Viceroy Lord Hardinge simply committed the two Armed Battalions to London and back in India, with the influence of Gandhi towering over political opinion of the country; Indians just decided to go fight Great War. For them, before it being World War One, it was a War for peace, a War for an independent India.

किसी भी सभ्य देश के लिए किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए युद्ध में कूद पड़ने का चुनाव शायद केवल आखिरी उपाय ही हो सकता है।  हिंसा किसी हद तक किसी हिंसक से अति हिंसक परिस्थिति का भी समुचित उत्तर नहीं कहला सकती। एक भारतीय के नाते , शायद प्रथम विश्व युद्ध में हमारे पास युद्ध के  कारणअकारण पर टिप्पणी करने  का कोई अधिकार था,बल्कि शायद हमारे पास इस बात का भी कोई प्रामाणिक हस्तक्षेप  भी नहीं मिलेगा कि आखिर हम प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन देश की सहायता के लिए कैसे तैयार  हो गये।  

ज़हरा ज़रीन जहां तक स्थिति की पारदर्शिता का सवाल  है , और जब दृष्टि १९१४ की ओर जाती है , मानो लगता है जैसे कि भारतीयों के पास कोई दूसरा चारा भी नहीं था, कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था।   अंग्रेज़ों का शासन था और  उनकी हुकूमत    भारतीयों को शायद पूछने , समझने या उनसे सलाह मशवरे  सवाल ही नहीं उठता  था।  वाइसराय लार्ड हार्डिंग ने लंदन को विश्व युद्ध एक के दौरान , सैन्य बल का वादा किया।  और पीछे कहीं गांधी के आदर्श और मूल्यों की राजनैतिक  लहर के चलते भारत इस महा युद्ध में तन,मन,धन से सहयोगी हो बैठा चूँकि एक भारतीय  के लिए , यह युद्ध प्रथम विश्व युद्ध से पहले , स्वतंत्रता के लिए लड़ाई थी , शांति के लिए बलिदान था।  


  Sikh Contingents mobilized

 Did they have any other choice?

क्या   भारतीयों के  पास युद्ध के मैदान पर उतरने के सिवा कोई अन्य विकल्प था

 Sitting back today, in the sanity of perception if we look at complete sentiments, this would sound to require lots of courage and wisdom to see our sons, brothers, husbands going to distant lands for completely unclear motives. And at those times, the training would mean a two days’ crash course in handling the Bayonet Rifles or learning defence mechanism on the job for those Indian soldiers who decided go fight the war.

आज ज़रा ठन्डे दिमाग से सोचने पर , हालांकि भावों की मौज तरंगिनी में बहाव के अंतर्गत भी , युद्ध के पीछे किसी प्रायोगिक समझदारी का प्रमाण नहीं मिलता।  अपने भाईबंधुयों को या फिर अपने बेटोंपतियों को किसी हद तक , दूरदर्राज़ अनजान नगरों , अनजान कारणों के लिए लड़ने भेज  देना, अपने में एक बहुत हिम्मत का काम है।  और यह भी उस ज़माने में जहां ,  मात्र दो घंटों के बन्दूकबाज़ी बेनट प्रशिक्षण के बाद उन्हें दुश्मन के भारी गोला बारूद के सामने उतार दिया गया।  

At that time, Indians didn’t really understand that sometimes the warm clothing is actually required to withstand chilling weather than just great determination or you need to know that poison gas is a poison gas even if you cover your mouth with the Pagri Dastaar. Wars are usually fought with Armed Preparations but in India’s case, the World War One was fought entirely on the strongholds of faith, gallantry, tradition & bravery even if that meant dying an unknown death, unwanted and among unknown strangers.  And for them, their innocence was their guardian angel.

उस समय शायद भोले और मासूम भारतीयों को यह अहसास नहीं था कि ठिठुरती ठंडी में गर्म कपडे भी ज़रूरी होते है , सिर्फ केवल दृढ़ निश्चय और कठोर इरादे।  उन्हें कौन बताता कि ज़हरीली गैस तो  ज़हरीली ही रहेगी चाहें  वो भोले भाले कितना ही अपने नाक मुंह को पगड़ीदस्तार से ढाँपे।  सरसरी तौर पर , युद्ध अक्सर , सैन्य संगठनों और सैन्य योजनाओं के साथ लड़े जाते हैं पर भारतीय जवानों ने प्रथम विश्व युद्ध अपने  विश्वासशौर्य , परंपरा और वीरता के बल पर लड़ा।  उनके लिये चाहें ही इसका मतलब अनजाने लोगो के बीच, अनजाने देसो में एक अनजानी शहादत ही क्यों न रहा हो। 

 They could have looked the other side, conspired with the enemy and by hook or crook won the independence; they could not bring themselves to any odd devices as that but.

हम भारतीय अपने विकल्प बदल सकते थे, हम भारतीय अपने रुख बदल सकते थे , शत्रु  पक्ष के साथ मिलकर साजिश  रच सकते थे , हम इतिहास का नैनो  नक्श  बदल सकते थे , पर हम  धर्म पर  बने रहे।  

World War One-Centenary Commemoration of Faith, Tradition , Gallantry & Sacrifice of the Indian Soldier thus was an occasion and opportunity to bring memories of the Indian Soldiers back  home, giving them an honorable place in the history as what an average Indian sees them like. For more and further, please visit

 प्रथम विश्व युद्धशतकीय  स्मृति  अवसर पर भारतीय जवान के विश्वास , परंपराशौर्य और कुर्बानी को सिर्फ हमने दोहराया बल्कि हम उन भूले बिसरे भारतीयों जवानों की याद को घर वापस ला कर, उचित सम्मान दे पाये।  इससे संबंधित और देखने , जानने के लिये ,

Different Campaigns, Various Battle Fronts 

युद्ध के कुछ मैदान जहां भारतीय सैनिक लड़े


 आप नीचे देख रहे हैं फ्रांस, बेल्जियम, गलीपोलि , मेसोपोटामियापलेस्टाइन, ग्रीस, चीन और वह स्मारक कोना जोकि विश्व युद्ध एक की प्रदर्शनी श्रृंखला में बहुत लोकप्रिय रहा।  यह प्रदर्शनी भारतीय सेना ने इंफिनिटी कम्युनिकेशंस के सहयोग के साथ प्रथम विश्व युद्ध के शहीदों की याद में आयोजित की।  

France Belgium


PalestineGreeceChinaMemorial Corner


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